श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

तत्र चन्द्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका।

तत्पुण्यसलिलैर्नित्यमुभयत्रात्मनो मृजन्॥ ३५

tatra candravasā nāma tāmraparṇī vaṭodakā|

tatpuṇyasalilairnityamubhayatrātmano mṛjan|| 35

अर्थ

वहाँ चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी और वटोदका नामकी तीन नदियाँ थीं। उनके पवित्र जलमें स्नान करके वे प्रतिदिन अपने शरीर और अन्तःकरणको निर्मल करते थे॥ ३५॥

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