इस प्रकार सौ दिव्य वर्षोंतक स्थाणुके समान निश्चलभावसे एक ही स्थानपर बैठे रहे। भगवान् वासुदेवमें सुदृढ़ प्रेम हो जानेके कारण इतने समयतक उन्हें शरीरादिका भी भान न हुआ॥ ३९॥✎ 1341
आस्ते स्थाणुरिवैकत्र दिव्यं वर्षशतं स्थिरः।
वासुदेवे भगवति नान्यद्वेदोद्वहन् रतिम्॥ ३९
इस प्रकार सौ दिव्य वर्षोंतक स्थाणुके समान निश्चलभावसे एक ही स्थानपर बैठे रहे। भगवान् वासुदेवमें सुदृढ़ प्रेम हो जानेके कारण इतने समयतक उन्हें शरीरादिका भी भान न हुआ॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 550) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1341 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विज्ञान-दीपकसे → विज्ञानदीपकसे