राजन्! गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरिके उपदेश किये हुए तथा अपने अन्तःकरणमें सब ओर स्फुरित होनेवाले विशुद्ध विज्ञानदीपकसे उन्होंने देखा कि अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रकाशक आत्मा स्वप्नावस्थाकी भाँति देहादि समस्त उपाधियोंमें व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है। ऐसा अनुभव करके वे सब ओरसे उदासीन हो गये॥ ४०-४१॥✎ 1341
यह अर्थ श्लोक 40–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि।
विद्वान् स्वप्न इवामर्शसाक्षिणं विरराम ह॥ ४०
राजन्! गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरिके उपदेश किये हुए तथा अपने अन्तःकरणमें सब ओर स्फुरित होनेवाले विशुद्ध विज्ञानदीपकसे उन्होंने देखा कि अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रकाशक आत्मा स्वप्नावस्थाकी भाँति देहादि समस्त उपाधियोंमें व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है। ऐसा अनुभव करके वे सब ओरसे उदासीन हो गये॥ ४०-४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 550) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1341 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विज्ञान-दीपकसे → विज्ञानदीपकसे