na patistvaṃ puraṃjanyā ruddho navamukhe yayā|| 60
अर्थ
देखो, तुम न तो विदर्भराजकी पुत्री ही हो और न यह वीर मलयध्वज तुम्हारा पति ही। जिसने तुम्हें नौ द्वारोंके नगरमें बंद किया था, उस पुरंजनीके पति भी तुम नहीं हो॥ ६०॥
न त्वं विदर्भदुहिता नायं वीरः सुहृत्तव।
न पतिस्त्वं पुरंजन्या रुद्धो नवमुखे यया॥ ६०
देखो, तुम न तो विदर्भराजकी पुत्री ही हो और न यह वीर मलयध्वज तुम्हारा पति ही। जिसने तुम्हें नौ द्वारोंके नगरमें बंद किया था, उस पुरंजनीके पति भी तुम नहीं हो॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 552) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/60/