तुम पहले जन्ममें अपनेको पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो—यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है। वास्तवमें तुम न पुरुष हो न स्त्री। हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो॥ ६१॥
माया ह्येषा मया सृष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम्।
मन्यसे नोभयं यद्वै हंसौ पश्यावयोर्गतिम्॥ ६१
तुम पहले जन्ममें अपनेको पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो—यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है। वास्तवमें तुम न पुरुष हो न स्त्री। हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 552) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/61/