श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.62

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अहं भवान्‍न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः।

न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि॥ ६२

ahaṃ bhavānna cānyastvaṃ tvamevāhaṃ vicakṣva bhoḥ|

na nau paśyanti kavayaśchidraṃ jātu manāgapi|| 62

अर्थ

मित्र! जो मैं (ईश्‍वर) हूँ, वही तुम (जीव) हो। तुम मुझसे भिन्‍न नहीं हो और तुम विचारपूर्वक देखो, मैं भी वही हूँ जो तुम हो। ज्ञानी पुरुष हम दोनोंमें कभी थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं देखते॥ ६२॥

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