गुदा और लिंग—ये नीचेके दो छिद्र पश्चिमके द्वार हैं। खद्योता और आविर्मुखी नामके जो दो द्वार एक स्थानपर बतलाये थे, वे नेत्रगोलक हैं तथा रूप विभ्राजित नामका देश है, जिसका इन द्वारोंसे जीव चक्षु-इन्द्रियकी सहायतासे अनुभव करता है। (चक्षु-इन्द्रियोंको ही पहले द्युमान् नामका सखा कहा गया है)॥ १०॥✎ 13431344
पश्चिमे इत्यधोद्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते।
खद्योताऽऽविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते।
रूपं विभ्राजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वरः॥ १०
गुदा और लिंग—ये नीचेके दो छिद्र पश्चिमके द्वार हैं। खद्योता और आविर्मुखी नामके जो दो द्वार एक स्थानपर बतलाये थे, वे नेत्रगोलक हैं तथा रूप विभ्राजित नामका देश है, जिसका इन द्वारोंसे जीव चक्षु-इन्द्रियकी सहायतासे अनुभव करता है। (चक्षु-इन्द्रियोंको ही पहले द्युमान् नामका सखा कहा गया है)॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 554) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/10/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—मिहोदिते।
(मुद्रित पृष्ठ 554)
२
प्रा० पा०—विचक्षे।
(मुद्रित पृष्ठ 554)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति