श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अक्षिणी नासिके आस्यमिति पंच पुरः कृताः।

दक्षिणा दक्षिणः कर्ण उत्तरा चोत्तरः स्मृतः॥ ९

akṣiṇī nāsike āsyamiti paṃca puraḥ kṛtāḥ|

dakṣiṇā dakṣiṇaḥ karṇa uttarā cottaraḥ smṛtaḥ|| 9

अर्थ

इसमें दो नेत्रगोलक, दो नासाछिद्र और एक मुख—ये पाँच पूर्वके द्वार हैं; दाहिने कानको दक्षिणका और बायें कानको उत्तरका द्वार समझना चाहिये॥ ९॥✎ 1343 1344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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