लिंग ही आसुरी नामका पश्चिमी द्वार है, स्त्रीप्रसंग ग्रामक नामका देश है और लिंगमें रहनेवाला उपस्थेन्द्रिय दुर्मद नामका मित्र है। गुदा निर्ऋति नामका पश्चिमी द्वार है॥ १४॥✎ 13431344
आसुरी मेढ्रमर्वाग्द्वार्व्यवायो ग्रामिणां रतिः।
उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निर्ऋतिर्गुद उच्यते॥ १४
लिंग ही आसुरी नामका पश्चिमी द्वार है, स्त्रीप्रसंग ग्रामक नामका देश है और लिंगमें रहनेवाला उपस्थेन्द्रिय दुर्मद नामका मित्र है। गुदा निर्ऋति नामका पश्चिमी द्वार है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 554) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#1039 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिर्गुद → निऋर्ऋतिर्गुद
#1040 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिर्गुद → निर्ऋतिर्गुद
#1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति