श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

वैशसं नरकं पायुर्लुब्धकोऽन्धौ तु मे शृणु।

हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च॥ १५

vaiśasaṃ narakaṃ pāyurlubdhako'ndhau tu me śṛṇu|

hastapādau pumāṃstābhyāṃ yukto yāti karoti ca|| 15

अर्थ

नरक वैशस नामका देश है और गुदामें स्थित पायु-इन्द्रिय लुब्धक नामका मित्र है। इनके सिवा दो पुरुष अंधे बताये गये थे, उनका रहस्य भी सुनो। वे हाथ और पाँव हैं; इन्हींकी सहायतासे जीव क्रमशः सब काम करता और जहाँ-तहाँ जाता है॥ १५॥✎ 1343 1344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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