वस्तुतः तो वह निर्गुण है, किन्तु प्राण, इन्द्रिय और मनके धर्मोंको अपनेमें आरोपित कर मैं-मेरेपनके अभिमानसे बँधकर क्षुद्र विषयोंका चिन्तन करता हुआ तरह-तरहके कर्म करता रहता है॥ २५॥✎ 134513461347
प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः।
शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत्॥ २५
वस्तुतः तो वह निर्गुण है, किन्तु प्राण, इन्द्रिय और मनके धर्मोंको अपनेमें आरोपित कर मैं-मेरेपनके अभिमानसे बँधकर क्षुद्र विषयोंका चिन्तन करता हुआ तरह-तरहके कर्म करता रहता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 556) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
#1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
#1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें