श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यदाऽऽत्मानमविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम्।

पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक्॥ २६

yadā''tmānamavijñāya bhagavantaṃ paraṃ gurum|

puruṣastu viṣajjeta guṇeṣu prakṛteḥ svadṛk|| 26

अर्थ

यह यद्यपि स्वयंप्रकाश है, तथापि जबतक सबके परमगुरु आत्मस्वरूप श्रीभगवान्‌के स्वरूपको नहीं जानता, तबतक प्रकृतिके गुणोंमें ही बँधा रहता है॥ २६॥✎ 1345 1346 1347

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
  • #1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
  • #1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें

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