शुद्धहृदय नरेन्द्र! जिस प्रकार स्वप्नमें होनेवाला स्वप्नान्तर उस स्वप्नसे सर्वथा छूटनेका उपाय नहीं है, उसी प्रकार कर्मफल-भोगसे सर्वथा छूटनेका उपाय केवल कर्म नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म और कर्मफलभोग दोनों ही अविद्यायुक्त होते हैं॥ ३४॥✎ 1607
नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम्।
द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ॥ ३४
शुद्धहृदय नरेन्द्र! जिस प्रकार स्वप्नमें होनेवाला स्वप्नान्तर उस स्वप्नसे सर्वथा छूटनेका उपाय नहीं है, उसी प्रकार कर्मफल-भोगसे सर्वथा छूटनेका उपाय केवल कर्म नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म और कर्मफलभोग दोनों ही अविद्यायुक्त होते हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 557) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)