श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम्।

द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ॥ ३४

naikāntataḥ pratīkāraḥ karmaṇāṃ karma kevalam|

dvayaṃ hyavidyopasṛtaṃ svapne svapna ivānagha|| 34

अर्थ

शुद्धहृदय नरेन्द्र! जिस प्रकार स्वप्नमें होनेवाला स्वप्नान्तर उस स्वप्नसे सर्वथा छूटनेका उपाय नहीं है, उसी प्रकार कर्मफल-भोगसे सर्वथा छूटनेका उपाय केवल कर्म नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म और कर्मफलभोग दोनों ही अविद्यायुक्त होते हैं॥ ३४॥✎ 1607

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1607 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-ज्ञान → आत्मज्ञान

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