श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।

मनसा लिंगरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा॥ ३५

arthe hyavidyamāne'pi saṃsṛtirna nivartate|

manasā liṃgarūpeṇa svapne vicarato yathā|| 35

अर्थ

जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें अपने मनोमय लिंगशरीरसे विचरनेवाले प्राणीको स्वप्नके पदार्थ न होनेपर भी भासते हैं, उसी प्रकार ये दृश्यपदार्थ वस्तुतः न होनेपर भी, जबतक अज्ञान-निद्रा नहीं टूटती, बने ही रहते हैं और जीवको जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्ति नहीं मिलती। (अतः इनकी आत्यन्तिक निवृत्तिका उपाय एकमात्र आत्मज्ञान ही है)॥ ३५॥✎ 1607

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1607 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-ज्ञान → आत्मज्ञान

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