श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः।

सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति॥ ३७

vāsudeve bhagavati bhaktiyogaḥ samāhitaḥ|

sadhrīcīnena vairāgyaṃ jñānaṃ ca janayiṣyati|| 37

अर्थ

भगवान् वासुदेवमें एकाग्रतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे किया हुआ भक्तिभाव ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव कर देता है॥ ३७॥✎ 419

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #419 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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