राजर्षे! यह भक्तिभाव भगवान्की कथाओंके आश्रित रहता है। इसलिये जो श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, उसे बहुत शीघ्र इसकी प्राप्ति हो जाती है॥ ३८॥✎ 419
सोऽचिरादेव राजर्षे स्यादच्युतकथाश्रयः।
शृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः॥ ३८
राजर्षे! यह भक्तिभाव भगवान्की कथाओंके आश्रित रहता है। इसलिये जो श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, उसे बहुत शीघ्र इसकी प्राप्ति हो जाती है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 557) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)