॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.29.39
यत्र भागवता राजन् साधवो विशदाशयाः।
भगवद्गुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतसः ॥ ३९
yatra bhāgavatā rājan sādhavo viśadāśayāḥ|
bhagavadguṇānukathanaśravaṇavyagracetasaḥ || 39
अर्थ
राजन्! जहाँ भगवद्गुणोंको कहने और सुननेमें तत्पर विशुद्धचित्त भक्तजन रहते हैं, उस साधु-समाजमें सब ओर महापुरुषोंके मुखसे निकले हुए श्रीमधुसूदनभगवान्के चरित्ररूप शुद्ध अमृतकी अनेकों नदियाँ बहती रहती हैं। जो लोग अतृप्त-चित्तसे श्रवणमें तत्पर अपने कर्णकुहरोंद्वारा उस अमृतका छककर पान करते हैं, उन्हें भूख-प्यास, भय, शोक और मोह आदि कुछ भी बाधा नहीं पहुँचा सकते॥ ३९-४०॥✎ 419