श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.82

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तत्रैकाग्रमना वीरो गोविन्दचरणाम्बुजम्।

विमुक्तसंगोऽनुभजन् भक्‍त्या तत्साम्यतामगात्॥ ८२

tatraikāgramanā vīro govindacaraṇāmbujam|

vimuktasaṃgo'nubhajan bhaktyā tatsāmyatāmagāt|| 82

अर्थ

वहाँ उन वीरवरने समस्त विषयोंकी आसक्ति छोड़ एकाग्र मनसे भक्तिपूर्वक श्रीहरिके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए सारूप्यपद प्राप्त किया॥ ८२॥

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