॥ श्रीहरिः ॥
एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ।
यः श्रावयेद्यः शृणुयात्स लिंगेन विमुच्यते॥ ८३
etadadhyātmapārokṣyaṃ gītaṃ devarṣiṇānagha|
yaḥ śrāvayedyaḥ śṛṇuyātsa liṃgena vimucyate|| 83
अर्थ
निष्पाप विदुरजी! देवर्षि नारदके परोक्षरूपसे कहे हुए इस आत्मज्ञानको जो पुरुष सुनेगा या सुनायेगा, वह शीघ्र ही लिंगदेहके बन्धनसे छूट जायगा॥ ८३॥
एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ।
यः श्रावयेद्यः शृणुयात्स लिंगेन विमुच्यते॥ ८३
निष्पाप विदुरजी! देवर्षि नारदके परोक्षरूपसे कहे हुए इस आत्मज्ञानको जो पुरुष सुनेगा या सुनायेगा, वह शीघ्र ही लिंगदेहके बन्धनसे छूट जायगा॥ ८३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.83 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 563) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/83/