श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.83

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ।

यः श्रावयेद्यः शृणुयात्स लिंगेन विमुच्यते॥ ८३

etadadhyātmapārokṣyaṃ gītaṃ devarṣiṇānagha|

yaḥ śrāvayedyaḥ śṛṇuyātsa liṃgena vimucyate|| 83

अर्थ

निष्पाप विदुरजी! देवर्षि नारदके परोक्षरूपसे कहे हुए इस आत्मज्ञानको जो पुरुष सुनेगा या सुनायेगा, वह शीघ्र ही लिंगदेहके बन्धनसे छूट जायगा॥ ८३॥

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