श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं

विधीयते साधु मिथः सुमध्यमे।

प्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा

गुहाशयायैव न देहमानिने॥ २२

pratyudgamapraśrayaṇābhivādanaṃ

vidhīyate sādhu mithaḥ sumadhyame|

prājñaiḥ parasmai puruṣāya cetasā

guhāśayāyaiva na dehamānine|| 22

अर्थ

सुमध्यमे! तुम कह सकती हो कि आपने प्रजापतियोंकी सभामें उनका आदर क्यों नहीं किया। सो ये सम्मुख जाना, नम्रता दिखाना, प्रणाम करना आदि क्रियाएँ जो लोकव्यवहारमें परस्पर की जाती हैं, तत्त्वज्ञानियोंके द्वारा बहुत अच्छे ढंगसे की जाती हैं। वे अन्तर्यामीरूपसे सबके अन्तःकरणोंमें स्थित परमपुरुष वासुदेवको ही प्रणामादि करते हैं; देहाभिमानी पुरुषको नहीं करते॥ २२॥

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