श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं

यदीयते तत्र पुमानपावृतः।

सत्त्वे च त*स्मिन् भगवान् वासुदेवो

ह्यधोक्षजो मे नमसा विधीयते॥ २३

sattvaṃ viśuddhaṃ vasudevaśabditaṃ

yadīyate tatra pumānapāvṛtaḥ|

sattve ca tasmin bhagavān vāsudevo

hyadhokṣajo me namasā vidhīyate|| 23

अर्थ

विशुद्ध अन्तःकरणका नाम ही ‘वसुदेव’ है, क्योंकि उसीमें भगवान् वासुदेवका अपरोक्ष अनुभव होता है। उस शुद्ध चित्तमें स्थित इन्द्रियातीत भगवान् वासुदेवको ही मैं नमस्कार किया करता हूँ॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. प्रा० पा०—यस्मि०।

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