श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

यावत्ते मायया स्पृष्टा भ्रमाम इह कर्मभिः।

तावद्भवत्प्रसंगानां संगः स्यान्‍नो भवे भवे॥ ३३

yāvatte māyayā spṛṣṭā bhramāma iha karmabhiḥ|

tāvadbhavatprasaṃgānāṃ saṃgaḥ syānno bhave bhave|| 33

अर्थ

हम आपसे केवल यही माँगते हैं कि जबतक आपकी मायासे मोहित होकर हम अपने कर्मानुसार संसारमें भ्रमते रहें, तबतक जन्म-जन्ममें हमें आपके प्रेमी भक्तोंका संग प्राप्त होता रहे॥ ३३॥✎ 423 1348

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #423 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1348 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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