श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

अपहतसकलैषणामलात्म-

न्यविरतमेधितभावनोपहूतः ।

निजजनवशगत्वमात्मनोऽय-

न्‍न सरति छिद्रवदक्षरः सतां हि॥ २०

apahatasakalaiṣaṇāmalātma-

nyaviratamedhitabhāvanopahūtaḥ |

nijajanavaśagatvamātmano'ya-

nna sarati chidravadakṣaraḥ satāṃ hi|| 20

अर्थ

पुत्रैषणा आदि सब प्रकारकी वासनाओंके निकल जानेसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, उन संतोंके हृदयमें उनके निरन्तर बढ़ते हुए चिन्तनसे खिंचकर अविनाशी श्रीहरि आ जाते हैं और अपनी भक्ताधीनताको चरितार्थ करते हुए हृदयाकाशकी भाँति वहाँसे हटते नहीं॥ २०॥✎ 1350

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1350 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भक्ता-धीनताको → भक्ताधीनताको

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