॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.31.21
न भजति कुमनीषिणां स इज्यां
हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः।
श्रुतधनकुलकर्मणां मदैर्ये
विदधति पापमकिंचनेषु सत्सु॥ २१
na bhajati kumanīṣiṇāṃ sa ijyāṃ
hariradhanātmadhanapriyo rasajñaḥ|
śrutadhanakulakarmaṇāṃ madairye
vidadhati pāpamakiṃcaneṣu satsu|| 21
अर्थ
भगवान् तो अपनेको (भगवान्को) ही सर्वस्व माननेवाले निर्धन पुरुषोंपर ही प्रेम करते हैं; क्योंकि वे परम रसज्ञ हैं—उन अकिंचनोंकी अनन्याश्रया अहैतुकी भक्तिमें कितना माधुर्य होता है, इसे प्रभु अच्छी तरह जानते हैं। जो लोग अपने शास्त्रज्ञान, धन, कुल और कर्मोंके मदसे उन्मत्त होकर, ऐसे निष्किंचन साधुजनोंका तिरस्कार करते हैं, उन दुर्बुद्धियोंकी पूजा तो प्रभु स्वीकार ही नहीं करते॥ २१॥✎ 431