श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

श्रियमनुच१रतीं तदर्थिनश्‍च ✎ 1042

द्विपदपतीन् विबुधांश्‍च य२त्स्वपूर्णः।

न भजति निजभृत्यवर्गतन्त्रः

कथममुमुद्विसृजेत्पुमान् कृतज्ञः॥ २२

śriyamanucaratīṃ tadarthinaśca

dvipadapatīn vibudhāṃśca yatsvapūrṇaḥ|

na bhajati nijabhṛtyavargatantraḥ

kathamamumudvisṛjetpumān kṛtajñaḥ|| 22

अर्थ

भगवान् स्वरूपानन्दसे ही परिपूर्ण हैं, उन्हें निरन्तर अपनी सेवामें रहनेवाली लक्ष्मीजी तथा उनकी इच्छा करनेवाले नरपति और देवताओंकी भी कोई परवा नहीं है। इतनेपर भी वे अपने भक्तोंके तो अधीन ही रहते हैं। अहो! ऐसे करुणा-सागर श्रीहरिको कोई भी कृतज्ञ पुरुष थोड़ी देरके लिये भी कैसे छोड़ सकता है?॥ २२॥✎ 431

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मनुसरतस्तदर्थि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 573)
  2. २

    प्रा० पा०—यत्सुपूर्णः।

    (मुद्रित पृष्ठ 573)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #431 शब्दोंके बीचका स्थान: (भगवान् को) → (भगवान्‌को)
  • #1042 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रियमनुच्र → श्रियमनुच

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