प्रचेतागण भी उनके मुखसे सम्पूर्ण जगत्के पापरूपी मलको दूर करनेवाले भगवच्चरित्र सुनकर भगवान्के चरणकमलोंका ही चिन्तन करने लगे और अन्तमें भगवद्धामको प्राप्त हुए॥ २४॥
तेऽपि तन्मुखनिर्यातं यशो लोकमलापहम्।
हरेर्निशम्य तत्पादं ध्यायन्तस्तद्गतिं ययुः॥ २४
प्रचेतागण भी उनके मुखसे सम्पूर्ण जगत्के पापरूपी मलको दूर करनेवाले भगवच्चरित्र सुनकर भगवान्के चरणकमलोंका ही चिन्तन करने लगे और अन्तमें भगवद्धामको प्राप्त हुए॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 573) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/24/