श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

एतत्तेऽभिहितं क्षत्तर्यन्मां त्वं परिपृष्टवान्।

प्रचेतसां नारदस्य संवादं हरिकीर्तनम्॥ २५

etatte'bhihitaṃ kṣattaryanmāṃ tvaṃ paripṛṣṭavān|

pracetasāṃ nāradasya saṃvādaṃ harikīrtanam|| 25

अर्थ

इस प्रकार आपने जो मुझसे श्रीनारदजी और प्रचेताओंके भगवत्कथासम्बन्धी संवादके विषयमें पूछा था, वह मैंने आपको सुना दिया॥ २५॥

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