॥ श्रीहरिः ॥
य एष उत्तानपदो मानवस्यानुवर्णितः।
वंशः प्रियव्रतस्यापि निबोध नृपसत्तम३॥ २६
ya eṣa uttānapado mānavasyānuvarṇitaḥ|
vaṃśaḥ priyavratasyāpi nibodha nṛpasattama|| 26
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! यहाँतक स्वायम्भुव मनुके पुत्र उत्तानपादके वंशका वर्णन हुआ, अब प्रियव्रतके वंशका विवरण भी सुनो॥ २६॥
य एष उत्तानपदो मानवस्यानुवर्णितः।
वंशः प्रियव्रतस्यापि निबोध नृपसत्तम॥ २६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! यहाँतक स्वायम्भुव मनुके पुत्र उत्तानपादके वंशका वर्णन हुआ, अब प्रियव्रतके वंशका विवरण भी सुनो॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 573) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/26/टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—नृप सम्मतम्।
(मुद्रित पृष्ठ 573)