श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

य एष उत्तानपदो मानवस्यानुवर्णितः।

वंशः प्रियव्रतस्यापि निबोध नृपसत्तम३॥ २६

ya eṣa uttānapado mānavasyānuvarṇitaḥ|

vaṃśaḥ priyavratasyāpi nibodha nṛpasattama|| 26

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! यहाँतक स्वायम्भुव मनुके पुत्र उत्तानपादके वंशका वर्णन हुआ, अब प्रियव्रतके वंशका विवरण भी सुनो॥ २६॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—नृप सम्मतम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 573)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें