श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यो नारदादात्मविद्यामधिगम्य पुनर्महीम्।

भुक्‍त्वा विभज्य पुत्रेभ्य ऐश्‍वरं समगात्पदम्॥ २७

yo nāradādātmavidyāmadhigamya punarmahīm|

bhuktvā vibhajya putrebhya aiśvaraṃ samagātpadam|| 27

अर्थ

राजा प्रियव्रतने श्रीनारदजीसे आत्मज्ञानका उपदेश पाकर भी राज्यभोग किया था तथा अन्तमें इस सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने पुत्रोंमें बाँटकर वे भगवान्‌के परमधामको प्राप्त हुए थे॥ २७॥

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