श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्यानम्य तमामन्त्र्य विदुरो गजसाह्वयम्।

स्वानां दिदृक्षुः प्रययौ ज्ञातीनां निर्वृताशयः॥ ३०

ityānamya tamāmantrya viduro gajasāhvayam|

svānāṃ didṛkṣuḥ prayayau jñātīnāṃ nirvṛtāśayaḥ|| 30

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—मैत्रेयजीको उपर्युक्त कृतज्ञता सूचक वचन कहकर तथा प्रणाम कर विदुरजीने उनसे आज्ञा ली और फिर शान्तचित्त होकर अपने बन्धुजनोंसे मिलनेके लिये वे हस्तिनापुर चले गये॥ ३०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें