प्रचेताओंने कहा—देवर्षे! आपका स्वागत है, आज बड़े भाग्यसे हमें आपका दर्शन हुआ। ब्रह्मन्! सूर्यके समान आपका घूमना-फिरना भी ज्ञानालोकसे समस्त जीवोंको अभय-दान देनेके लिये ही होता है॥ ५॥
स्वागतं ते सुरर्षेऽद्य दिष्ट्या नो दर्शनं गतः।
तव चङ्क्रमणं ब्रह्मन्नभयाय यथा रवेः॥ ५
प्रचेताओंने कहा—देवर्षे! आपका स्वागत है, आज बड़े भाग्यसे हमें आपका दर्शन हुआ। ब्रह्मन्! सूर्यके समान आपका घूमना-फिरना भी ज्ञानालोकसे समस्त जीवोंको अभय-दान देनेके लिये ही होता है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 570) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/5/