श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

प्रचेतस ऊचुः

स्वागतं ते सुरर्षेऽद्य दिष्ट्या नो दर्शनं गतः।

तव चङ्‌क्रमणं ब्रह्मन्‍नभयाय यथा रवेः॥ ५

svāgataṃ te surarṣe'dya diṣṭyā no darśanaṃ gataḥ|

tava caṅkramaṇaṃ brahmannabhayāya yathā raveḥ|| 5

अर्थ

प्रचेताओंने कहा—देवर्षे! आपका स्वागत है, आज बड़े भाग्यसे हमें आपका दर्शन हुआ। ब्रह्मन्! सूर्यके समान आपका घूमना-फिरना भी ज्ञानालोकसे समस्त जीवोंको अभय-दान देनेके लिये ही होता है॥ ५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें