tad gṛheṣu prasaktānāṃ prāyaśaḥ kṣapitaṃ prabho|| 6
अर्थ
प्रभो! भगवान् शंकर और श्रीविष्णुभगवान्ने हमें जो उपदेश दिया था, उसे गृहस्थीमें आसक्त रहनेके कारण हमलोग प्रायः भूल गये हैं॥ ६॥✎ 426
यदादिष्टं भगवता शिवेनाधोक्षजेन च।
तद् गृहेषु प्रसक्तानां प्रायशः क्षपितं प्रभो॥ ६
प्रभो! भगवान् शंकर और श्रीविष्णुभगवान्ने हमें जो उपदेश दिया था, उसे गृहस्थीमें आसक्त रहनेके कारण हमलोग प्रायः भूल गये हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 570) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/6/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—प्रायो नः।
(मुद्रित पृष्ठ 570)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#426 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् ने → श्रीविष्णुभगवान्ने