अतः आप हमारे हृदयोंमें उस परमार्थतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले अध्यात्मज्ञानको फिर प्रकाशित कर दीजिये, जिससे हम सुगमतासे ही इस दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायँ॥ ७॥
तन्नः प्रद्योतयाध्यात्मज्ञानं तत्त्वार्थदर्शनम्।
येनांजसा तरिष्यामो दुस्तरं भवसागरम्॥ ७
अतः आप हमारे हृदयोंमें उस परमार्थतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले अध्यात्मज्ञानको फिर प्रकाशित कर दीजिये, जिससे हम सुगमतासे ही इस दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायँ॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 570) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/7/