श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.5.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यस्त्वन्तकाले व्युप्तजटाकलापः

स्वशूलसूच्यर्पितदिग्गजेन्द्रः ।

वितत्य नृत्यत्युदितास्त्रदोर्ध्वजा-

नुच्चाट्टहासस्तनयित्नुभिन्‍नदिक्॥ १०

yastvantakāle vyuptajaṭākalāpaḥ

svaśūlasūcyarpitadiggajendraḥ |

vitatya nṛtyatyuditāstradordhvajā-

nuccāṭṭahāsastanayitnubhinnadik|| 10

अर्थ

(अथवा हो न हो यह संहारमूर्ति भगवान् रुद्रके अनादरका ही परिणाम है।) प्रलयकाल उपस्थित होनेपर जिस समय वे अपने जटाजूटको बिखेरकर तथा शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित अपनी भुजाओंको ध्वजाओंके समान फैलाकर ताण्डव नृत्य करते हैं, उस समय उनके त्रिशूलके फलोंसे दिग्गज बिंध जाते हैं तथा उनके मेघगर्जनके समान भयंकर अट्टहाससे दिशाएँ विदीर्ण हो जाती हैं॥ १०॥

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