श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.5.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

प्रसूतिमिश्राः स्त्रिय उद्विग्नचित्ता

ऊचुर्विपाको वृजिनस्यैष तस्य।

यत्पश्यन्तीनां दुहितॄणां प्रजेशः ✎ 1021

सुतां सतीमवदध्यावनागाम्॥ ९

prasūtimiśrāḥ striya udvignacittā

ūcurvipāko vṛjinasyaiṣa tasya|

yatpaśyantīnāṃ duhitṝṇāṃ prajeśaḥ

sutāṃ satīmavadadhyāvanāgām|| 9

अर्थ

तब दक्षपत्नी प्रसूति एवं अन्य स्त्रियोंने व्याकुल होकर कहा—प्रजापति दक्षने अपनी सारी कन्याओंके सामने बेचारी निरपराधा सतीका तिरस्कार किया था; मालूम होता है यह उसी पापका फल है॥ ९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1021 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दुहितृणां → दुहितॄणां

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें