तब दक्षपत्नी प्रसूति एवं अन्य स्त्रियोंने व्याकुल होकर कहा—प्रजापति दक्षने अपनी सारी कन्याओंके सामने बेचारी निरपराधा सतीका तिरस्कार किया था; मालूम होता है यह उसी पापका फल है॥ ९॥
प्रसूतिमिश्राः स्त्रिय उद्विग्नचित्ता
ऊचुर्विपाको वृजिनस्यैष तस्य।
यत्पश्यन्तीनां दुहितॄणां प्रजेशः
सुतां सतीमवदध्यावनागाम्॥ ९
तब दक्षपत्नी प्रसूति एवं अन्य स्त्रियोंने व्याकुल होकर कहा—प्रजापति दक्षने अपनी सारी कन्याओंके सामने बेचारी निरपराधा सतीका तिरस्कार किया था; मालूम होता है यह उसी पापका फल है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.5.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 425) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/5/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1021 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दुहितृणां → दुहितॄणां