॥ श्रीहरिः ॥
रुरुजुर्यज्ञपात्राणि तथैकेऽग्नीननाशयन्।
कुण्डेष्वमूत्रयन् केचिद्बिभिदुर्वेदिमेखलाः॥ १५
rurujuryajñapātrāṇi tathaike'gnīnanāśayan|
kuṇḍeṣvamūtrayan kecidbibhidurvedimekhalāḥ|| 15
अर्थ
किन्हींने यज्ञके पात्र फोड़ दिये, किन्हींने अग्नियोंको बुझा दिया, किन्हींने यज्ञकुण्डोंमें पेशाब कर दिया और किन्हींने वेदीकी सीमाके सूत्रोंको तोड़ डाला॥ १५॥
रुरुजुर्यज्ञपात्राणि तथैकेऽग्नीननाशयन्।
कुण्डेष्वमूत्रयन् केचिद्बिभिदुर्वेदिमेखलाः॥ १५
किन्हींने यज्ञके पात्र फोड़ दिये, किन्हींने अग्नियोंको बुझा दिया, किन्हींने यज्ञकुण्डोंमें पेशाब कर दिया और किन्हींने वेदीकी सीमाके सूत्रोंको तोड़ डाला॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.5.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 426) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/5/15/