जब किसी भी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे दक्षकी त्वचा नहीं कटी, तब वीरभद्रको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बहुत देरतक विचार करते रहे॥ २३॥
शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेवमनिर्भिन्नत्वचं हरः।
विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम्॥ २३
जब किसी भी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे दक्षकी त्वचा नहीं कटी, तब वीरभद्रको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बहुत देरतक विचार करते रहे॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.5.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 427) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/5/23/