॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.6.2
संछिन्नभिन्नसर्वाङ्गाः सर्त्विक्सभ्या भयाकुलाः।
स्वयम्भुवे नमस्कृत्य कार्त्स्न्येनैतन्न्यवेदयन्॥ २
saṃchinnabhinnasarvāṅgāḥ sartviksabhyā bhayākulāḥ|
svayambhuve namaskṛtya kārtsnyenaitannyavedayan|| 2
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार जब रुद्रके सेवकोंने समस्त देवताओंको हरा दिया और उनके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग भूत-प्रेतोंके त्रिशूल, पट्टिश, खड्ग, गदा, परिघ और मुद्गर आदि आयुधोंसे छिन्न-भिन्न हो गये तब वे ऋत्विज् और सदस्योंके सहित बहुत ही डरकर ब्रह्माजीके पास पहुँचे और प्रणाम करके उन्हें सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ १-२॥✎ 1918