श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

लिंगं च तापसाभीष्टं भस्मदण्डजटाजिनम्।

अंगेन संध्याभ्ररुचा चन्द्रलेखां च बिभ्रतम्॥ ३६

liṃgaṃ ca tāpasābhīṣṭaṃ bhasmadaṇḍajaṭājinam|

aṃgena saṃdhyābhrarucā candralekhāṃ ca bibhratam|| 36

अर्थ

सन्ध्याकालीन मेघकी-सी कान्तिवाले शरीरपर वे तपस्वियोंके अभीष्ट चिह्न—भस्म, दण्ड, जटा और मृगचर्म एवं मस्तकपर चन्द्रकला धारण किये हुए थे॥ ३६॥

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