श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

उपविष्टं दर्भमय्यां बृस्यां ब्रह्म सनातनम्।

नारदाय प्रवोचन्तं पृच्छते शृण्वतां सताम्॥ ३७

upaviṣṭaṃ darbhamayyāṃ bṛsyāṃ brahma sanātanam|

nāradāya pravocantaṃ pṛcchate śṛṇvatāṃ satām|| 37

अर्थ

वे एक कुशासनपर बैठे थे और अनेकों साधु श्रोताओंके बीचमें श्रीनारदजीके पूछनेसे सनातन ब्रह्मका उपदेश कर रहे थे॥ ३७॥

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