॥ श्रीहरिः ॥
उपविष्टं दर्भमय्यां बृस्यां ब्रह्म सनातनम्।
नारदाय प्रवोचन्तं पृच्छते शृण्वतां सताम्॥ ३७
upaviṣṭaṃ darbhamayyāṃ bṛsyāṃ brahma sanātanam|
nāradāya pravocantaṃ pṛcchate śṛṇvatāṃ satām|| 37
अर्थ
वे एक कुशासनपर बैठे थे और अनेकों साधु श्रोताओंके बीचमें श्रीनारदजीके पूछनेसे सनातन ब्रह्मका उपदेश कर रहे थे॥ ३७॥
उपविष्टं दर्भमय्यां बृस्यां ब्रह्म सनातनम्।
नारदाय प्रवोचन्तं पृच्छते शृण्वतां सताम्॥ ३७
वे एक कुशासनपर बैठे थे और अनेकों साधु श्रोताओंके बीचमें श्रीनारदजीके पूछनेसे सनातन ब्रह्मका उपदेश कर रहे थे॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 431) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/37/