॥ श्रीहरिः ॥
कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं पादपद्मं च जानुनि।
बाहुं प्रकोष्ठेऽक्षमालामासीनं तर्कमुद्रया॥ ३८
kṛtvorau dakṣiṇe savyaṃ pādapadmaṃ ca jānuni|
bāhuṃ prakoṣṭhe'kṣamālāmāsīnaṃ tarkamudrayā|| 38
अर्थ
उनका बायाँ चरण दायीं जाँघपर रखा था। वे बायाँ हाथ बायें घुटनेपर रखे, कलाईमें रुद्राक्षकी माला डाले तर्कमुद्रासे* विराजमान थे॥ ३८॥
कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं पादपद्मं च जानुनि।
बाहुं प्रकोष्ठेऽक्षमालामासीनं तर्कमुद्रया॥ ३८
उनका बायाँ चरण दायीं जाँघपर रखा था। वे बायाँ हाथ बायें घुटनेपर रखे, कलाईमें रुद्राक्षकी माला डाले तर्कमुद्रासेविराजमान थे॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 431) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/38/टिप्पणियाँ
- *
तर्जनीको अँगूठेसे जोड़कर अन्य अँगुलियोंको आपसमें मिलाकर फैला देनेसे जो बन्ध सिद्ध होता है, उसे ‘तर्कमुद्रा’ कहते हैं। इसका नाम ज्ञानमुद्रा भी है।
(मुद्रित पृष्ठ 431)