श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.41

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तथापरे सिद्धगणा महर्षिभि-

र्ये वै समन्तादनु नीललोहितम्।

नमस्कृतः प्राह शशाङ्कशेखरं

कृतप्रणामं प्रहसन्‍निवात्मभूः॥ ४१

tathāpare siddhagaṇā maharṣibhi-

rye vai samantādanu nīlalohitam|

namaskṛtaḥ prāha śaśāṅkaśekharaṃ

kṛtapraṇāmaṃ prahasannivātmabhūḥ|| 41

अर्थ

इसी प्रकार शंकरजीके चारों ओर जो महर्षियोंसहित अन्यान्य सिद्धगण बैठे थे, उन्होंने भी ब्रह्माजीको प्रणाम किया। सबके नमस्कार कर चुकनेपर ब्रह्माजीने चन्द्रमौलि भगवान्‌से, जो अबतक प्रणामकी मुद्रामें ही खड़े थे, हँसते हुए कहा॥ ४१॥✎ 359 1319 1320

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #359 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से, → भगवान्‌से,
  • #1319 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महर्षियों-सहित → महर्षियोंसहित
  • #1320 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वामना-वतारमें → वामनावतारमें

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें