श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वक्षस्यधिश्रितवधूर्वनमाल्युदार-

हासावलोककलया रमयंश्‍च विश्‍वम्।

पार्श्वभ्रमद‍्व्यजनचामरराजहंसः

श्वेतातपत्रशशिनोपरि रज्यमानः॥ २१

vakṣasyadhiśritavadhūrvanamālyudāra-

hāsāvalokakalayā ramayaṃśca viśvam|

pārśvabhramadvyajanacāmararājahaṃsaḥ

śvetātapatraśaśinopari rajyamānaḥ|| 21

अर्थ

प्रभुके हृदयमें श्रीवत्सका चिह्न था और सुन्दर वनमाला सुशोभित थी। वे अपने उदार हास और लीलामय कटाक्षसे सारे संसारको आनन्दमग्न कर रहे थे। पार्षदगण दोनों ओर राजहंसके समान सफेद पंखे और चँवर डुला रहे थे। भगवान्‌के मस्तकपर चन्द्रमाके समान शुभ्र छत्र शोभा दे रहा था॥ २१॥✎ 362

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #362 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें