श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

दक्षो गृहीतार्हणसादनोत्तमं

यज्ञेश्‍वरं विश्‍वसृजां परं गुरुम्।

सुनन्दनन्दाद्यनुगैर्वृतं मुदा

गृणन् प्रपेदे प्रयतः कृतांजलिः॥ २५

dakṣo gṛhītārhaṇasādanottamaṃ

yajñeśvaraṃ viśvasṛjāṃ paraṃ gurum|

sunandanandādyanugairvṛtaṃ mudā

gṛṇan prapede prayataḥ kṛtāṃjaliḥ|| 25

अर्थ

सबसे पहले प्रजापति दक्ष एक उत्तम पात्रमें पूजाकी सामग्री ले नन्द-सुनन्दादि पार्षदोंसे घिरे हुए, प्रजापतियोंके परमगुरु भगवान् यज्ञेश्‍वरके पास गये और अति आनन्दित हो विनीतभावसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करते प्रभुके शरणापन्‍न हुए॥ २५॥✎ 363

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #363 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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