॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.7.28
सदस्या ऊचुः
उत्पत्त्यध्वन्यशरण उरुक्लेशदुर्गेऽन्तकोग्र-
व्यालान्विष्टे विषयमृगतृष्यात्मगेहोरुभारः।
द्वन्द्वश्वभ्रे खलमृगभये शोकदावेऽज्ञसार्थः
पादौकस्ते शरणद कदा याति कामोपसृष्टः॥ २८
utpattyadhvanyaśaraṇa urukleśadurge'ntakogra-
vyālānviṣṭe viṣayamṛgatṛṣyātmagehorubhāraḥ|
dvandvaśvabhre khalamṛgabhaye śokadāve'jñasārthaḥ
pādaukaste śaraṇada kadā yāti kāmopasṛṣṭaḥ|| 28
अर्थ
सदस्योंने कहा—जीवोंको आश्रय देनेवाले प्रभो! जो अनेक प्रकारके क्लेशोंके कारण अत्यन्त दुर्गम है, जिसमें कालरूप भयंकर सर्प ताकमें बैठा हुआ है, द्वन्द्वरूप अनेकों गढ़े हैं, दुर्जनरूप जंगली जीवोंका भय है तथा शोकरूप दावानल धधक रहा है—ऐसे, विश्राम-स्थलसे रहित संसारमार्गमें जो अज्ञानी जीव कामनाओंसे पीड़ित होकर विषयरूप मृगतृष्णाजलके लिये ही देह-गेहका भारी बोझा सिरपर लिये जा रहे हैं, वे भला आपके चरणकमलोंकी शरणमें कब आने लगे॥ २८॥