श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

रुद्र उवाच

तव वरद वराङ्घ्रावाशिषेहाखिलार्थे

ह्यपि मुनिभिरसक्तैरादरेणार्हणीये।

यदि रचितधियं माविद्यलोकोऽपविद्धं

जपति न गणये तत्त्वत्परानुग्रहेण॥ २९

tava varada varāṅghrāvāśiṣehākhilārthe

hyapi munibhirasaktairādareṇārhaṇīye|

yadi racitadhiyaṃ māvidyaloko'paviddhaṃ

japati na gaṇaye tattvatparānugraheṇa|| 29

अर्थ

रुद्रने कहा—वरदायक प्रभो! आपके उत्तम चरण इस संसारमें सकाम पुरुषोंको सम्पूर्ण पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाले हैं; और जिन्हें किसी भी वस्तुकी कामना नहीं है, वे निष्काम मुनिजन भी उनका आदरपूर्वक पूजन करते हैं। उनमें चित्त लगा रहनेके कारण यदि अज्ञानी लोग मुझे आचार भ्रष्ट कहते हैं, तो कहें; आपके परम अनुग्रहसे मैं उनके कहने-सुननेका कोई विचार नहीं करता॥ २९॥

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