॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.7.37
लोकपाला ऊचुः
दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं
प्रत्यग्द्रष्टा दृश्यते येन दृश्यम्।
माया ह्येषा भवदीया हि भूमन्
यस्त्वं षष्ठः पंचभिर्भासि भूतैः॥ ३७
dṛṣṭaḥ kiṃ no dṛgbhirasadgrahaistvaṃ
pratyagdraṣṭā dṛśyate yena dṛśyam|
māyā hyeṣā bhavadīyā hi bhūman
yastvaṃ ṣaṣṭhaḥ paṃcabhirbhāsi bhūtaiḥ|| 37
अर्थ
लोकपालोंने कहा—अनन्त परमात्मन्! आप समस्त अन्तःकरणोंके साक्षी हैं, यह सारा जगत् आपके ही द्वारा देखा जाता है। तो क्या मायिक पदार्थोंको ग्रहण करनेवाली हमारी इन नेत्र आदि इन्द्रियोंसे कभी आप प्रत्यक्ष हो सके हैं? वस्तुतः आप हैं तो पंचभूतोंसे पृथक्; फिर भी पांचभौतिक शरीरोंके साथ जो आपका सम्बन्ध प्रतीत होता है, यह आपकी माया ही है॥ ३७॥