॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.7.38
योगेश्वरा ऊचुः
प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमुतस्त्वयि प्रभो
विश्वात्मनीक्षेन्न पृथग्य आत्मनः।
अथापि भक्त्येशतयोपधावता-
मनन्यवृत्त्यानुगृहाण वत्सल॥ ३८
preyānna te'nyo'styamutastvayi prabho
viśvātmanīkṣenna pṛthagya ātmanaḥ|
athāpi bhaktyeśatayopadhāvatā-
mananyavṛttyānugṛhāṇa vatsala|| 38
अर्थ
योगेश्वरोंने कहा—प्रभो! जो पुरुष सम्पूर्ण विश्वके आत्मा आपमें और अपनेमें कोई भेद नहीं देखता, उससे अधिक प्यारा आपको कोई नहीं है। तथापि भक्तवत्सल! जो लोग आपमें स्वामिभाव रखकर अनन्य भक्तिसे आपकी सेवा करते हैं, उनपर भी आप कृपा कीजिये॥ ३८॥