श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.44

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

विद्याधरा ऊचुः

त्वन्माययार्थमभिपद्य कलेवरेऽस्मिन्

कृत्वा ममाहमिति दुर्मतिरुत्पथैः स्वैः।

क्षिप्तोऽप्यसद्विषयलालस आत्ममोहं

युष्मत्कथामृतनिषेवक उद‍्व्युदस्येत्॥ ४४

tvanmāyayārthamabhipadya kalevare'smin

kṛtvā mamāhamiti durmatirutpathaiḥ svaiḥ|

kṣipto'pyasadviṣayalālasa ātmamohaṃ

yuṣmatkathāmṛtaniṣevaka udvyudasyet|| 44

अर्थ

विद्याधरोंने कहा—प्रभो! परम पुरुषार्थकी प्राप्तिके साधनरूप इस मानवदेहको पाकर भी जीव आपकी मायासे मोहित होकर इसमें मैं-मेरेपनका अभिमान कर लेता है। फिर वह दुर्बुद्धि अपने आत्मीयोंसे तिरस्कृत होनेपर भी असत् विषयोंकी ही लालसा करता रहता है। किन्तु ऐसी अवस्थामें भी जो आपके कथामृतका सेवन करता है, वह इस अन्तःकरणके मोहको सर्वथा त्याग देता है॥ ४४॥

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