फिर एकाग्रचित्त हो भगवान् शंकरका यज्ञशेषरूप उनके भागसे यजन किया तथा समाप्तिमें किये जानेवाले उदवसान नामक कर्मसे अन्य सोमपायी एवं दूसरे देवताओंका यजन कर यज्ञका उपसंहार किया और अन्तमें ऋत्विजोंके सहित अवभृथ-स्नान किया॥ ५६॥
रुद्रं च स्वेन भागेन ह्युपाधावत्समाहितः।
कर्मणोदवसानेन सोमपानितरानपि।
उदवस्य सहर्त्विग्भिः सस्नाववभृथं ततः॥ ५६
फिर एकाग्रचित्त हो भगवान् शंकरका यज्ञशेषरूप उनके भागसे यजन किया तथा समाप्तिमें किये जानेवाले उदवसान नामक कर्मसे अन्य सोमपायी एवं दूसरे देवताओंका यजन कर यज्ञका उपसंहार किया और अन्तमें ऋत्विजोंके सहित अवभृथ-स्नान किया॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 442) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/56/