श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.56

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

रुद्रं च स्वेन भागेन ह्युपाधावत्समाहितः।

कर्मणोद२वसानेन सोमपानितरानपि।

उदवस्य सहर्त्विग्भिः सस्नाववभृथं ततः॥ ५६

rudraṃ ca svena bhāgena hyupādhāvatsamāhitaḥ|

karmaṇodavasānena somapānitarānapi|

udavasya sahartvigbhiḥ sasnāvavabhṛthaṃ tataḥ|| 56

अर्थ

फिर एकाग्रचित्त हो भगवान् शंकरका यज्ञशेषरूप उनके भागसे यजन किया तथा समाप्तिमें किये जानेवाले उदवसान नामक कर्मसे अन्य सोमपायी एवं दूसरे देवताओंका यजन कर यज्ञका उपसंहार किया और अन्तमें ऋत्विजोंके सहित अवभृथ-स्नान किया॥ ५६॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—णो ह्यव०।

    (मुद्रित पृष्ठ 442)

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